क्या आने वाली पीढ़ियां वास्तविक आदिवासी संस्कृति को भूल जाएगी??
"मेरी संस्कृति मेरा अभिमान"
•••••••••••••••••••••••••••••
जय बिरसा🌱🌱🌱🌱🌱🌱
जोहार🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
"सगाजनों,वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियां वास्तविक आदिवासी संस्कृति को भूल जाएगी??"
: राकेश देवडे़ बिरसावादी
"संस्कृति,बोली,भाषा, परंपरा, रीति रिवाज, रहन सहन, पहनावा, सामूहिकता, वाद्य यंत्र, कृषि के साधन,घट्टी,तवला,मोटा अनाज ( ज्वार बाजरा, मक्का) पेड़, पौधे, प्रकृति," ।पता नहीं क्यों संस्कृति से लेकर प्रकृति तक उक्त सभी बातों को आदिवासी समुदाय भूलने लगा है जिसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, यदि नहीं तो भविष्य में भुगतने को तैयार रहें।ऐसा क्यों कहां मैंने? विचार कीजिए? आदिवासी समुदाय में पहले महिलाएं नॉटी पहनती थी जिसमें काछडे़ से कमर को कसकर बांध लेती थी,कमर कड़क रहती थी, जब वह गर्भधारण करती थी तो गर्भ में पल रहा बच्चा इधर-उधर नहीं खसकता था, 9 महीने के बाद जब गर्भ काल की समय अवधि पूर्ण हो जाती थी तब आसानी से प्राकृतिक डिलीवरी हो जाया करती थी, आदिवासी गुगल हमारे बापदादा के मुंह से सुना था कहीं आंगन में ,चूल्हे के पास, खेत में खलियान में, कहीं भी आसानी से डिलीवरी हो जाती थी। लेकिन वर्तमान आधुनिकता के युग में इतने आधुनिक हो गए हम कि बिना ऑपरेशन के बच्चा पैदा ही नहीं हो रहा है भविष्य में इसके परिणाम घातक हो सकतें हैं। अधिकतर डिलीवरी सीजर से हो रही हैं, सीजर एक ऐसी शल्यक्रिया है, जिसमें एक या एक से अधिक शिशुओं के जन्म के लिए या कभी-कभी मृत भ्रूण को बाहर निकालने के लिए मां के पेट और गर्भाशय में एक या एक से अधिक चीरे लगाए जाते हैं। इमरजेंसी में ठीक है लेकिन वर्तमान समय में यह धंधा बन चुका है। "विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुशंसा करता है कि सीजेरियन सेक्शन तभी किया जाए जब चिकित्सकीय रूप से आवश्यक हो।" शरणार्थियों के रहन-सहन पहनावे को आत्मसात कर आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल मेरा प्राकृतिक समाज अपनी प्रकृति संस्कृति से दूर जा रहा है जो चिंताजनक है।आधुनिकता की अंधी दौड़ में आदर्शों का पतन हो रहा है।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid02DWYQyYEHUjP1U368s8yehMhzH2AUzeKVb2HU4DQ8Rn6kgAsFoKc6GshZn3Ropufnl&id=100003323568717&sfnsn=wiwspmo&mibextid=RUbZ1f खुद की आदिवासी संस्कृति से समझौता किया जा रहा है और तो और अब लोग खुद को भी भूलने लगे हैं कि किन परंपराओं और संस्कृतियों के साथ उनका लालन-पालन हुआ।आज पूरे आदिवासी समुदाय में पाश्चात्य विदेशी संस्कृति अपनी जड़ें जमा चुकी है।शहरों में नहीं बल्कि गांव की गलियों तक इसका प्रभाव आप आसानी से देख सकते हैं। ऐसे ही हालत रही तो वह दिन दूर नहीं जब लोग वास्तविक आदिवासी संस्कृति को भूल जाएंगे।"
: राकेश देवडे़ बिरसावादी
9617638602
(सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी लेखक, संस्कृति शोधार्थी,विश्लेषक)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें