महुआ
"महुआ के पेड़ और प्राचीन आदिवासी समाज का बहुत गहरा नाता है। जब अनाज नहीं था तब आदिम आदिवासी समाज के लोग महुआ के फल को खाकर अपना जीवन गुजारते थे, आदिवासी समाज के पारंपरिक सांस्कृतिक लोकगीतों में महुआ के गीत गाए जाते हैं। विशेष प्राकृतिक अवसरों पर आज भी महुआ के पेड़ की पूजा की जाती है। जंसिता केरकेट्टा की एक सुंदर कविता! क्यों महुआ तोड़े नही जाते पेड़ से •••••••••••••••••••••••••••••••• माँ तुम सारी रात क्यों महुए के गिरने का इंतज़ार करती हो ? क्यों नही पेड़ से ही सारा महुआ तोड़ लेती हो ? माँ कहती है वे रात भर गर्भ में रहते है जन्म का हो जाता है समय पूरा खुद ब खुद धरती पर आ गिरते है।। इतनी बात ने दिल दिमाग़ में बहुत जगह बना दी।। " ✍️सामाजिक कार्यकर्ता राकेश देवडे़ बिरसावादी जयस बिरसा ब्रिगेड महुआ (वानस्पतिक नाम : Madhuca longifolia/mahua लोंगफोलिआ) महुआ के फूलों से देशी शराब बनायी जाती है। रसायन (केमिकल) से मुक्त महुआ की मोंद (शराब) का उपयोग आदिवासी पुरखो/खत्रीज को चढा़ने तथा प्राकृतिक पूजा अ...