इंदलदेव / इंदिराजा पूजन

✍️शोध/संकलन - रोहित पड़ियार (सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी गीतकार ,लेखक)
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इंदलदेव / इंदिराजा का पूजन मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र में भील और भिलाला आदिवासी द्वारा किया जाता है। इसके पीछे बहुत सी मान्यता रही है।
इंद पाटला पूजन के पीछे हमारे क्षेत्र में प्रचलित मान्यता इस प्रकार है ।
कहा जाता है कि रेव्या रेट ( आदिवासी मान्यताओ में प्रचलित मरुस्थल ) में अरिहरण व करिहरण के यहाँ पर इंदिराजा, पाटीराजा, अबाकुनबी व दुधाकुनबी ( पुत्र ) और वावुबाई, खेड़ूबाई, जातुबाई व कातुबाई ( पुत्री ) जन्म हुआ था। इंदिराजा और पाटीराजा को दुधन चवरी में पयवणे के बाद भूरिया खुटार में बसाया गया था इसलिए जब भी इंदलपाटला किया जाता है तो सबसे पहले खुटे गाड़े जाते है।जब उपरोक्त देवता जब भूरिया खुटार में बसे तो वहाँ पर सबसे पहली वाड़ी लिम्बी ( निम्बू ), दूसरी वाड़ी केवी ( केला ) की, तीसरी वाड़ी लहसन की, चौथी वाड़ी दुंगली ( प्याज ) और पाँचवी वाड़ी आणिहरण - कणीहरण / कणसर ( ज्वार ) की लगाई गई। इसलिए इंदल पूजन में भी सबसे पहले नीबू का इस्तेमाल होता है।
क्योकि इंदिराजा और पाटीराजा कणीहरण / कणसर ( ज्वार ) के बेटे थे इसलिए इनके पूजन में जो कनबा/ कलम के पेड़ की डाल को ज्वार के दानों में रोप कर रात भर उनकी पूजा की जाती है।https://m.youtube.com/watch?v=NEw2DU0ZK7I&feature=youtu.beइंदलपूजन की शुरुआत किस प्रकार हुई इसकी कथा रानीकाजल माता, कुनबाई ( पति ), कुंदूराणु (देवर ) गाथा से जुड़ी हुई है।( इस गाथा को आपके सामने रखने के लिए मैं भविष्य में अलग से लेख उपलब्ध करूंगा)कहा जाता है कि जब रानीकाजल माता और कुनबाई की महाराष्ट्र के हेलादाब में शादी होने के बाद जब मथवाड़ आकर बसी उस समय भयंकर अकाल पड़ा था, न तो सन्तानो की उत्पत्ति हो रही थी, न पशुधन पल रहा था, न बारिश हो रही थी और न ही फसल उत्पन हो रही थी। रानीकाजल माता बिल्कुल निःसंतान थी। ऐसे वक्त में इंदिराजा, पाटीराजा, अबाकुनबी व दुधाकुनबी और वावुबाई, खेड़ूबाई, जातुबाई व कातुबाई का इस क्षेत्र से गुजरना हुआ तो उन्होंने राजा (कुनबाई) और रानी (काजल माता) की इस पीड़ा को देखा और इस कष्ट से मुक्ति का उपाय बताया।रानीकाजल माता तथा कुनबाई ने  उनके द्वारा बताई गई विधि अनुसार इंदिराजा पाटीराजा का पूजन कनबा / कलम की तीन डाल ज्वार में डालकर विधिवत तरीके से की जिसके परिणाम स्वरूप बारिश भी हुई, ज्वार ( कणीहर) जो एक साल पहले बोई गई थी किन्तु बारिश बिल्कुल नही हुई थी इस वजह से नही उगी थी वह दूसरे वर्ष जब इंद पूजा हुई तब बहुत ही शानदार तरीके से पैदावार हुई। पशुधन प्राप्त हुआ , सन्तान उत्पति हुई जिससे आदिवासी कुल आगे बढ़ पाया औऱ इस प्रकार इंदलपूजा की शुरुआत हुई।आज भी इंदपाटले की पूजा कुनबी ( आदिवासी किसान ) के लिए की जाती है जिसमे आदिवासी परिवार, खेतीबाड़ी, फसल, मालधन, पशु पक्षी आदि सब कुछ कुशल मंगल हो ऐसी कामना की जाती है।
नोट चुकी आदिवासी पंरपरा मौखिक रूप से प्रचिलित है इसलिए लिए अलग अलग क्षेत्र में अलग अलग कथा हो सकती है लेकिन इंद पूजन का मूलभाव यही है।
जय आदिवासी, जय जोहर।
जय इंदिराजा, जय पाटी राजा, जय माँ रानीकाजल।
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